पत्रकारों की स्वतंत्र लेखनी पर कुठाराघात क्यों ?
पत्रकारों की स्वतंत्र लेखनी पर कुठाराघात क्यों ?
त्वरित टिप्पड़ी-घनश्याम पाठक की कलम से✍🏻
.....तो क्या पत्रकार अब अफसरों से पूछ कर करे पत्रकारिता !
वाराणसी।पत्रकारों पर आए दिन नेताओं,सरकारी सेवकों और तो और तीखे सवाल पूछे जाने व खबर चलाने व छापने पर बड़े राजनेता व बड़े अधिकारी तक भी अपने आपा खो देते हैं। लगातार किये जा रहे पत्रकारों के साथ अपशब्द,अपमानजनक व्यवहार,मारपीट,गाली-गलौज,केस में फंसाने की धमकी,फर्जी मुकदमे दर्ज करवा देना,मारने-मरवाने तक की धमकी देकर प्रताड़ित और अपमानित की जाती है,जो दु:खद, निंदनीय ही नहीं पत्रकारों के पूछे जाने वाले सवालों और स्वतंत्र लेखनी की आजादी पर कुठाराघात है।पीपीसी के प्रदेश अध्य्क्ष घनश्याम पाठक इस तरह की सभी घटनाओ की तिव्र निंदा करते है। ऐसे मामलों में प्रदेश व देश के सभी पत्रकारों को आपसी भेद भाव भुलाकर अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए।
अक्सर यह देखा जाता है कि प्रशासन,पुलिस व नेताओ की वीडियो कैद किये जाने पर कैमरा, मोबाइल आदि छीनकर पत्रकारों को कुछ घंटे तक पकड़कर उन्हें बंधक बना लिया जाता है या साजिश के तहत पत्रकारों के खिलाफ अपराधिक मुकदमे दर्ज करवा कर उन्हें जेल के सलाखों में डलवा दिया जाता है।पत्रकार प्रेस क्लब इस तरीके की अब तक दर्जनों लड़ाइयां भी लड़ चुकी है। तथ्यों की बिबेचना करने से असलियत तो यह निकलती है कि सरकार की छवि पत्रकार नही बल्कि राजनेता के इशारे पर चलने वाले उनके करीबी प्रशासनिक व पुलिस के अधिकारी बिगाड़ते है। शासन की योजनाओं को सच मे संचालित किए जाने लगे तो बखेड़ा खड़ा ही नही होगा। इसी कड़ी का हिस्सा तो मिर्जापुर जिले का सेउर प्राथमिक विद्यालय भी है।जंहा बच्चो को मिडडेमील के तहत उनकी थाली में सिर्फ नमक रोटी परोसा जाता था।पत्रकार पवन जायसवाल ने तो सरकार की कुशल योजना में बड़े पैमाने हो रही घपलेबाजी को उजागर कर सरकार को सच बताने का कार्य किया था।सरकार के सख्त तेवर पर डीएम ने एक्शन लेते हुए बीएसए का स्थानांतरण करने के साथ एबीएसए व हेडमास्टर को निलंबित कर दिया।परंतु डीएम अनुराग पटेल किसके दबाव में आकर पत्रकार पवन जायसवाल के खिलाफ अहरौरा थाने में मुकदमा दर्ज करवा दिया।बदले की भावना से हुई कारवाई से डीएम साहब सवालों के घेरे में आ गए है।आरोप तो यह भी है कि डीएम साहब के यूटर्न लेने के पीछे एमडीएम घोटाले का कमीशन या किसी राजनेताओ का दबाव भी हो सकता है ? बहरहाल यह जांच का मुद्दा है।सीएम साहब को चाहिए कि मामले की उच्चस्तरीय जांच करादे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।सीएम साहब से एक अनुरोध और भी है कि सरकारी योजनाओं को ज्यादा कागज पर और कम हकीकत में संचालित करने वाले अफसरों के खिलाफ जांच कराकर कार्यवाई करने के साथ ही पत्रकारों की आजादी पर हमला करने वाले दोषियों पर भी कठोर कार्यवाई करे।जिससे पत्रकार स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता कर सके। विचारणीय प्रश्न तो अब यह है कि क्या अब पत्रकार अफसरों से पूछ कर खबर लिखे या स्वतंत्र होकर।
घनश्याम पाठक प्रदेश अध्य्क्ष यूपी।
04 सितंबर 19